देसंविवि, हरिद्वार : स्वावलम्बन को ध्यान में रखते हुए। देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने खादी ग्राम उद्योग स्वावलम्बन प्रशिक्षण केन्द्र की शुरूआत की। विश्वविद्यालय में खादी ग्राम उद्योग चलाने का उदेश्य लोगों को रोजगार देने की कोशिश है। खादी ग्राम उद्योग ग्राम प्रबंधन के अन्तर्गत ही आता है। कई तरह की प्रक्रिया जैसे ऊन से धागा बनाना, फिर उसकी मशीन के द्वारा बुनाई करना और अंत में फिनीशिंग करने के बाद कपड़ा तैयार होता है। यहाँ अमृतसर से ऊन के गत्ते मँगवाए जाते हैं, जिसे बुनकर स्टोल्स, सूटिंग फैब्रिक्स, जैकेट का कपड़ा, शॉल, कालीन, पांवदान, कम्बल आदि वस्तुओं को तैयार किया जाता है। इन वस्तुओं को तैयार करने के लिए लाई सैटेलाइट करघा मशीन एवं न्यू मॉडल अम्बर चरखा मषीनों के द्वारा कॉटन के धागे, कॉटन और पालिस्टर मिक्स धागों का उपयोग किया जाता है। जिसमें लाई सैटेलाइट करघा मशीन पुरुषों द्वारा इस्तेमाल की जाती है और न्यू मॉडल अम्बर चरखा का इस्तेमाल महिलाओं द्वारा होता है। लगभग चालीस महिलाएं और बारह पुरुष कताई का काम संभालते हैं तथा दो महिलाएँ बुनाई का, साथ ही साथ चार इन्स्ट्रक्टर इस उद्योग में कताई एवं बुनाई की तीन माह की ट्रेनिंग भी देते हैं। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी का कहना है कि स्वावलम्बन व्यापार नहीं बल्कि एक वृत्ति का नाम है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार की सारी गतिविधियाँ हमारे सच्चे ब्रह्मणत्व की सिद्धि है। भविष्य में उसी से युग बदलेगा । उन्होंने इसे एक फिक्स डिपाजिट की तरह बताया।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय की इस पहल को देखकर निश्चित ही यह लगता है कि फिर से खादी के दिन लौट आयेंगे। घर-घर में सूतों की कताई की गूंज से भारत फिर से सशक्त व समृद्ध होगा। वास्तव में यही होगा राष्ट्रपिता के सपनों का भारत।