विज्ञान और संचार के बीच का सेतु है भाषाः डॉ. चमोला

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में हुई विज्ञान संचार के अवसर और चुनौतियां विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला

विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग एवं उत्तराखंड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नालॉजी के संयुक्त तत्वावधान सम्‍पन्‍न हुई कार्यशाला

15 मार्च, 2013, देसंविवि: हम प्रगति के पथ पर निरंतर अग्रसर है। विज्ञान के क्षेत्र में भी हमने अनेक आयामों को छुआ है। परंतु वैज्ञानिक खोजों की महत्ता तभी है, जब वह जनोपयोगी सिद्ध हो सके। संचार के विभिन्न स्वरूपों के माध्यम से विज्ञान को सरलीकृत रूप को आम जनता तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। विज्ञान के इसी सर्वोपयोगी संचार पर के अवसरों एवं चुनौतियों पर विमर्श करने के लिए, देव संस्कृति विश्वविद्यालय में विज्ञान संचार के अवसर और चुनौतियां विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग एवं उत्तराखंड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नालॉजी के संयुक्त तत्वावधान में हुई सम्पन्न हुई।

कार्यशाला के शुभारंभ के अवसर पर प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. चिन्यम पण्ड्या ने विज्ञान संचार के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विकास की दो धाराएं हैं-एक है ज्ञान तथा दूसरी विज्ञान। ज्ञान का अर्थ है अध्यात्म और विज्ञान को हम भौतिक जगत की प्रगति के रूप में देख सकते हैं। उन्होंने कहा जब इन दोनों धाराओं का समन्वय होता है, तभी पूर्ण संचार संभव है। उन्होंने शंकराचार्य जी द्वारा रचित चरपट पंजिका के श्लोंकों के माध्यम से वर्तमान स्थिति को समझने का प्रयास किया।

शुभारंभ अवसर पर विशिष्ट अतिथि दैनिक हिन्दुस्तान, देहरादून के स्थानीय संपादक गिरीश गुररानी ने समाचार पत्रों और वर्तमान पत्रकारिता जगत में विज्ञान संचार विषय के नदारद होने पर खेद जताते हुए कहा कि आज विज्ञान के सरली की महती आवश्यकता है। जिससे विज्ञान की आवाज जन-जन तक पहुंचे और वह जनोपयोगी बन सके। उन्होंने अपने पत्रकारिता के जीवनकाल के अनुभवों को निचोड़ उपस्थिति विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने पत्रकारों से आवाहन किया कि वह विज्ञान संचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विज्ञान और जन के बीच सेतु बनें। यदि ऐसा संभव हो सकता तो विज्ञान संचार की चुनौतियां स्वतः ही समाप्त हो जायेंगी। उन्होंने पत्रकारों से तथ्यमेव जयते का नारा अपनाने के लिए प्रतिबद्ध रहने की अपील की।

प्रथम एवं द्वितीय तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून में राज्यभाषा विभाग के अध्यक्ष डाॅ. दिनेश चन्द्र चमोला ‘शैलेष’ ने विज्ञान संचार की भूमिका एवं विज्ञान लेखन की बारीकियों से प्रतिभागियों को अवगत करवाया। उन्होंने कहा विज्ञान और संचार, गंगा के दो किनारे हैं, भाषा इनके बीच एक पुल के समान है। यदि भाषा की समझ को विकसित नहीं किया गया तो किसी भी तरह का संचार विफल हो जाएगा। उन्होंने विज्ञान संचार की शब्दावली विकसित करने पर जोर दिया। इसी सत्र के अंत में प्रतिभागियों को पर्यावरण पर जागरूक बनाने के लिए एक लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया।

कार्यशाला के अंतिम तकनीकी सत्र में तीर्थांकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद में एप्लाइड साइंस विभाग के एसिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अवनीश चैहान जी ने पर्यावरण के ज्वलंत मुद्दों से प्रतिभागियों से अवगत कराया। इसके बाद सम्पन्न हुई विज्ञान संचार से संबंधित विभिन्न गतिविधियों में प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इन गतिविधियों में विजयी प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। कार्यशाला का समापन प्रमाण-पत्र वितरण के साथ हुआ।

इससे पूर्व कार्यशाला शुभारंभ के अवसर पर समस्त अतिथियों को स्वागत गायत्री मंत्र चादर, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा रचित युगसाहित्य सेट एवं गुलदस्ते के माध्यम से किया गया। इस दौरान स्मृति चिन्ह भी प्रदान किये गए।

कार्यशाला में विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, बी.एड. एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के 100 से अधिक प्रतिभागियों के साथ-साथ कार्यशाला समन्वयक डॉ. स्मिता वशिष्ठ, पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डॉ. सुखनंदन सिंह, जनसंपर्क विभाग के महेन्द्र शर्मा, योग विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेश वर्णवाल, पर्यटन प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अरूणेश पाराशर, बीएड विभाग के डॉ. रमन सिंह सहित अन्‍य विभागों के अध्‍यापक भी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन अंकुर मेहता ने किया।