19वाँ ज्ञान दीक्षा समारोह सम्पन्न

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भारत को विश्व का सिरमौर बनाने का पुरुषार्थ करें युवा -डॉ० पण्ड्या

शान्तिकुन्ज की मूल्यपरक शिक्षा-विद्या के ब्रह्मबीज सारे विश्व में फैलायें – श्री मदन कौशिक जी

ताकत को नियंत्रित करना सीखे युवा शक्ति – श्री वीरेश्वर उपाध्याय

हरिद्वार, १० जुलाई । विश्व मानवता इन दिनों परिवर्तन के महानतम क्षणों से गुजर रही है । देवभूमि भारतवर्ष को इस समय अपनी महती भूमिका निभानी है । हमारे युवा आगामी नौ वर्षों में देश को विश्व का सिरमौर बनाने के लिए कमर कसकर कार्य करें । इसके लिए उन्हें अपने-आपको अध्ययनशील, मननशील व चिन्तनशील बनाना होगा ।

यह उद्गार आज शान्तिकुन्ज के मुख्य सभागार में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के १९वें ज्ञान दीक्षा समारोह में विवि के कुलाधिपति एवं सभाध्यक्ष डॉ० प्रणव पण्ड्या ने व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि घोटालों का ज्ञान-विज्ञान सिखाने वाली शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा । यह परिवर्तन ‘शिक्षा एवं विद्या’ के सम्मिश्रण से ही सम्भव है । डॉ० पण्ड्या ने क्रान्तिकारी बाघा जतिन की गम्भीर संघर्षों के बाद मृत्यु से प्रेरित होकर भारत की आजादी के परम क्रान्तिवीर बने सरदार भगत सिंह के कसक भरे शौर्य को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए युवा पीढ़ी का आह्वान किया कि वह राष्ट के गौरव की रक्षा करें और आसन्न चुनौतियों का डटकर मुकाबला करें।

इसके पहले कुलाधिपति ने नवागंतुक छात्र-छात्राओं को ज्ञान दीक्षा दी । स्नातक को ‘ज्ञान से नहाया हुआ’ बताते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से महापुरुषों को अपना रोल मॉडल बनाकर जीवन के शीर्ष तक पहुँचने को कहा । कुलाधिपति ने समस्त आचार्यों की ओर से देववाणी संस्कृत में मंत्र-सूक्त बोले और विद्यार्थियों ने ‘मान्य’ कहकर उन पर अपनी स्वीकृति दी । उन्होंने भारत के 18 प्रान्तों के अलावा रूस, जापान, द.कोरिया, स्पेन एवं स्लोवाक रिपब्लिक से आए छात्र-छात्राओं को प्रतीक रूप में विवि का बैच लगाया ।

मुख्य अतिथि के रूप में पधारे नगर विकास, पर्यटन एवं गन्ना मंत्री श्री मदन कौशिक ने देसंविवि की ज्ञान दीक्षा को देश के सभी विश्वविद्यालयों में लागू करने की आवश्यकता जताई । शान्तिकुन्ज में मूल्यपरक शिक्षा व विद्या के ब्रह्मबीजों का सभी शिक्षालयों एवं विद्यालयों में रोपण करने की वकालत करते हुए श्री कौशिक ने देसंविवि को देवभूमि उत्तराखण्ड का गौरव बताया । आचार्य चाणक्य के संघर्षमय व सफल जीवन की चर्चा करते हुए मंत्रीजी ने शिक्षकों को इक्कीसवीं सदी के अभिनव भारतवर्ष के निर्माण के लिए चन्द्रगुप्त जैसे शिष्य गढ़ने की सलाह दी ।

उन्होंने देसंविवि के नए कुलपति प्रो० सुखदेव शर्मा का धर्मनगरी की जनता की ओर से स्वागत किया ।

शान्तिकुन्ज के वरिष्ठ मनीषी श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने बुद्धि व धन के बढ़ने के साथ उस पर नियन्त्रण की तकनीक युवा शक्ति को सिखाने की जरूरत पर बल दिया । कहा कि बाहर के कौशल का नियन्त्रक हमारा आन्तरिक व्यक्तित्व है । उन्होंने भारत को अनूठा राष्ट बताया और कहा कि हमारे लाखों करोड़ रुपये विदेशों मे जमा होने के बावजूद आर्थिक मन्दी से उबरने की क्षमता केवल भारतवर्ष के ही पास है । श्री उपाध्याय ने विद्यार्थियों से अपनी रुचि के आध्यात्मिक मण्डल बनाकर निरन्तर समूह चर्चा करने और अपनी क्षमताओं में वृद्धि करने की अपील की ।

शान्तिकुन्ज व्यवस्थापक श्री गौरीशंकर शर्मा ने ज्ञान दीक्षा के सूत्र नवप्रवेशी छात्र-छात्राओं को समझाए । शिक्षा व विद्या, विज्ञान व ज्ञान और संसार व अध्यात्म के बीच के अन्तर, दोनों के महत्व और सन्तुलन के साथ इन्हें जीवन में धारण करने के तरीके बताते हुए उन्होंने आत्म-निरीक्षण व आत्म-सुधार करते हुए आत्म-विकास के निरन्तर प्रयास करने की प्रेरणा विद्यार्थियों को दी ।

इसके पूर्व देसंविवि के कुलपति प्रो० सुखदेव शर्मा ने अपने स्वागत उद्बोधन में विवि द्वारा शिक्षा जगत में मानव मूल्यों की प्राण-प्रतिष्ठा की दिशा में किये गए प्रयासों का जिक्र किया । उन्होंने नालन्दा, तक्षशिला एवं विक्रमशिला जैसे गरिमामयी संस्कृतिनिष्ठ प्राचीन विश्वविद्यालयों की पुर्नस्थापना की जरूरत बताई । प्रो० शर्मा ने संतोष व्यक्त किया कि देसंविवि इस दिशा में गम्भीरता से आगे बढ़ रहा है ।

विवि में संस्कृत व वेद विभाग के प्रवक्ता डॉ० गायत्री किशोर त्रिवेदी एवं संस्कार प्रकोष्ठ के प्रतिनिधि श्री उदय किशोर मिश्र ने दीक्षा के कर्मकाण्ड का संचालन किया । संचालन शान्तिकुन्ज के वरिष्ठ प्रतिनिधि डॉ० बृजमोहन गौड़ तथा आभार ज्ञापन देसंविवि के कुलसचिव श्री सन्दीप कुमार ने किया । इस मौके पर पूर्व कुलपति डॉ० एस. पी. मिश्र, प्रति-कुलपति डॉ० चिन्मय पण्ड्या सहित सभी विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक एवं अधिकारी, शान्तिकुन्ज-ब्रह्मवर्चस के कार्यकर्ता तथा देश भार से आए शिविरार्थी मौजूद थे ।

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