Admission Open in the Distance Education Program    Call for Papers - IJYR    NAD : For Online Availability and Verification of Documents    Two Day All India Sanskrit Research Conference    Skill Development Workshops (CCAM) 2017-18    Call for Papers (UGC approved journal- DSIIJ)

देसंविवि में त्रिदिवसीय मनोविज्ञान सेमिनार सम्पन्न

Camps / Workshops / SeminarsComments Off on देसंविवि में त्रिदिवसीय मनोविज्ञान सेमिनार सम्पन्न

भावों की सम्पदा बढ़ाकर पाएँ मनोरोगों से मुक्ति -प्रो० विनय पाठक

परिष्कृत चेतना से लाएँ जीवन में सुख व शान्ति – कुलपति

आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर बढ़ रहा युवाओं का रुझान -प्रो० कुठियाल

क्रासर : समस्याओं की सुरसा के सामने खड़े हों समाधान के हनुमान -डॉ० पण्ड्या

मनःचिकित्सा का मर्म है भाव संवेदना – वीरेश्वर उपाध्याय

हरिद्वार, 27 मार्च । पश्चिम का दर्शन समाज को, दुनिया को बाजार मानता है जब कि भारतीय संस्कृति उसे परिवार मानती है । पश्चिमी देशों द्वारा ग्राहक ढूँढे जाते हैं, भारत साधक तलाशता और उन्हें विकसित करता है । पश्चिम उपभोग सिखाता है और हमारा देश उपयोग पर बल देता है । पश्चिम अभाव को जन्म देता है जबकि भारत भावों की सम्पदा का विकास करता है । अभाव ही दुनिया भर में मनोविकारों को जन्म दे रहा है । भावों की सम्पदा बढ़ाकर ही मनारोगों से मुक्ति पायी जा सकती है ।
यह उद्गार आज देव संस्कृति विश्वविद्यालय में ”मनोचिकित्सा की भारतीय विधियाँ : अवधारणा एवं प्रयोग” विषय पर सम्पन्न तीन दिवसीय सेमिनार के समापन अवसर पर उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० विनय कुमार पाठक ने व्यक्त किए । वह बतौर मुख्य अतिथि देश भर से आए मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों एवं शोधार्थियों को सम्बोधित कर रहे थे । उन्होंने आश्शा व्यक्त की कि देसंविवि का यह सेमिनार हमारे देश में बढ़ती मनोरोगों की समस्या को रोकने की मजबूत आधार-भूमि तैयार करेगा । वैदिक गणित के उद्भट् विद्वान व देवभूमि उत्तराखण्ड के सबसे कम उम्र के कुलपति प्रो० पाठक ने देसंविवि द्वारा विकसित पाठ्यक्रमों एवं कार्यक्रमों को प्रदेश व देश के कोने-कोने में फैलाने का संकल्प व्यक्त किया ।
इस अवसर पर देसंविवि के कुलपति डॉ० एस. पी. मिश्र ने कहा कि परिष्कृत चेतना ऐसी मानसिकता को जन्म देती है, जो अपने साथ सुख, समृद्धि एवं शान्ति लेकर आती है । उन्होंने कहा कि मनोरोगों के निदान के लिए हमें चेतना के परिष्कार पर सर्वाधिक ध्यान देना होगा । स्कूल ऑफ योग एण्ड हेल्थ के निदेशक डॉ० चिन्मय पण्ड्या ने देसंविवि में पधारे विशेषज्ञों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उद्वेग, सन्ताप, भटकाव व दुख से भरा मनुष्य सुख व शान्ति की कल्पना कैसे कर सकता है । उन्होंने समस्याओं की सुरसा के सामने समाधान के हनुमान खड़े करने का आह्वान युवा शोधार्थियों से किया और मन में जन्म लेकर शरीर में पनपने वाली बीमारियों के समूल नाश का देसंविवि का संकल्प दुहराया । जन्मशताब्दी पर आचार्य श्रीराम शर्मा की मनोचिकित्सा पद्धति का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास व्यक्ति समस्या लेकर आता था और वहाँ से सुनिश्चित समाधान लेकर वापस जाता था । इसी का परिणाम है कि देश-विदेश में दस करोड़ से ज्यादा उनका परिकर मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण का सपना साकार करने में संलग्न है ।
सेमिनार में मनोचिकित्सा पर गहरे विचार मंथन से कई महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आए । लोक कहानियों द्वारा मनोरोगों का निदान, प्रार्थना से मानसिक स्वास्थ्य, स्वाध्याय एक सम्पूर्ण चिकित्सा आदि नये-नये विशय आज युवा शोधार्थियों ने बड़ी प्रखरता के साथ पटल पर रखें । माखन लाल चर्तुवेदी विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो० वी० के० कुठियाल ने यहाँ युवा शोधार्थियों को देखकर सुखद आश्चर्य व्यक्त किया कि धर्मनगरी हरिद्वार में इतने युवक-युवतियाँ भगवद्गीता व आध्यात्मिक चिकित्सा आदि का गहन अध्ययन कर भारतीय मनोविज्ञान एवं देव संस्कृति के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने में लगे हैं । उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए बड़े गौरव की बात है ।
चीन की राजधानी बीजिंग स्थित जीयांस्की विश्विद्यालय के प्रो० यू० जिंग ने बतौर सत्राध्यक्ष कहा कि देव संस्कृति विवि में आकर मुझे अपने घर जैसा लग लग रहा हैं । यहाँ के विद्यार्थी और शिक्षकों का व्यवहार और उनके चेहरे की सहज प्रसन्नता को देखकर मेरा ऐसा मत है कि मनोरोगी यहां आकर खुद ब खुद ठीक हो जाएंगे ।
सेमिनार में देसंविवि के कुलपिता ‘आचार्य श्रीराम शर्मा के साहित्य में मनोचिकित्सा’ विषय पर शोधार्थी छात्रों ने प्राचीन भारतीय मान्यताओं को अनूठे वैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत किया । इस मौके पर शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्ता कालीचरण शर्मा ने कहा कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य के सोचने और उसकी चिंतन की क्षमता का विकास करना है, जो इस तरह के सेमिनार के माध्यम से सहज ही हो रहा है ।
शांतिकुंज मनीषी वीरेश्वर उपाध्याय ने भाव संवेदना को मनोचिकित्सा का सार बताया । उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कार पद्धति में ऐसे ढेरों तत्व भरे पड़े हैं, जिससे इन संस्कारों से जुड़कर व्यक्ति जीवन के हर पड़ाव पर न केवल स्वयं मानसिक रूप से स्वास्थ्य रहता है बल्कि वह अनेकों को इस दिशा में अग्रसर करने में सफल होता है ।
सेमिनार आयोजन समिति के सचिव एवं मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ० हिमाद्री साव ने बताया कि सेमिनार में 400 से ज्यादा शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए । अलग-अलग चरणों में श्रेष्ठ प्रस्तुतियों के लिए प्रथम पुरस्कार सचिन कुमार, संदीप कुमार, विभा तिवारी, कविता पाण्डेय, अवधेश त्रिपाठी, एस. गौतमी, डॉ. चीनू अग्रवाल, मनप्रीत कौर एवं रूद्र भंडारी को दिए गए ।
सेमिनार में गुरुकुल कांगड़ी विवि के गुरुकुल कांगड़ी के प्रो० सी. पी. खोखर व प्रो० ईश्वर भारद्वाज, गुरुनानकदेव विवि अमृतसर की प्रो० सुनिन्दर तुंग, पन्तनगर कृषि विवि की प्रो० यामा खोखर, वॉस्टन विवि अमेरिका की प्रो. मोरिन, हैदराबाद की प्रख्यात प्राण चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. स्वर्णलता, कन्या गुरुकुल महाविद्यालय हरिद्वार की प्रो. श्यामलता, दिल्ली विवि के प्रो० एन० के० चड्ढा आदि मौजूद थे ।

Copyright © 2002-2017.
Dev Sanskriti Vishwavidyalaya.
All rights reserved.